अहले ग़ाज़ा ने तारीख़ के पन्नों में अपनी शुजाअत और बहादुर ?
ज़िंदा क़ौम सब्र और इस्तेक़ामत का निशान बन गयी है कि हर साँस में ये लोग गोया सब्र का पैग़ाम दे रहे हों। इन्हें लोगों ने अपनी आँखों के सामने इंसानियत को मरता हुआ देखा लेकिन फिर भी अहले ग़ाज़ा टूटे नहीं ।एक दिन ये ज़ुल्म मिट जाएगा, सहयूनी कब़्ज़ा ख़त्म हो जाएगा और ग़ाज़ा बाक़ी रह जाएगा कि फ़ातेहीन तकबीर की सदाओं के साथ ग़ाज़ा में दाख़िल होंगे। ये वो क़ौम है कि जो पहाड़ों के बराबर मज़ालिम से ना टूटी, जिसके ऊपर आसमान से आग बरसती रही जिसके मासूम मलबो में दफ़्न हो गए, पर एक दिन इन्हीं मलबों से ग़ाज़ा उठ खड़ी होगी और तकबीर की सदाएँ बुलंद करेगी…